मैंने इसे एक मज़ाक की तरह लिया। मज़ाक
जो कि फटे-पुराने कपड़े पहने उस छोटे-सेलड़के के लिए था जो जनपथ के भीड़-भाड़
वाले चौराहे की लाल बत्ती पर अखबार बेचता।
था। मैं जब भी जहां से साइकिल से गुजरता,
वह अंग्रेजी का अखबार हाथ में लहराते
पीछे भागा और उस दिन की स्त्रियों को
हूँ।
हिंदी-अंग्रेजी के मिले-जुले शब्दों में चिल्लाकर ।
सुनता रहता। इस बार मैं पटरी के सहारे रुका
और मैंने उससे अंग्रेजी का अखबार माँगा। उसका
मुँह खुला का खुला रह गया। उसने पूछा,
“मतलब, आपको अंग्रेजी आती है?"
"बिल्कुल", मैंने अखबार के पैसे देते हुए कहा।
"क्यों? तुमने क्या सोचा?" वह रुका।
"मतलब कि आप अंग्रेजी पढ़ भी सकते हैं?"
"हाँ, बिल्कुल पढ़ सकता हूँ।" इस बार मैं
थोड़ा अधीर होते हुए बोला। "मैं अंग्रेजी बोल
सकता हूँ, पढ़ सकता हूँ और लिख भी सकता
हूँ। मैंने स्कूल में दूसरे ‘सब्जेक्ट' (विषय) के
साथ अंग्रेजी पढ़ी है।"
"सब्जेक्ट" उसने पूछा। अब जो कभी
स्कूल नहीं गया उसको मैं क्या समझाता कि
सब्जेक्ट क्या होता है वह कुछ होता है।
मैंने शुरू किया ही था कि बत्ती हरी हो गई
और मेरे पोछे गाड़ियों के हॉर्न का शोर सौ गुना
बढ़ गया। मैंने भी अपने आप को ट्रैफिक के
साथ आगे बढ़ने दिया।
अगले दिन वह फिर से वहाँ पर था। वह
मुस्करा रहा था और मेरी तरफ अंग्रेजी का :
अखबार बढ़ाते हुए उसने कहा, "भैया, आपका :
अखबार। अब बताइए ये सब्जेक्ट क्या चीज़
है?" अंग्रेजी का यह शब्द उसकी जुबान पर
अजीब लग रहा था। ऐसा लगा मानो अंग्रेजी में
'सब्जेक्ट' शब्द का जो दूसरा अर्थ है 'प्रजा',
उस अर्थ में वह उसका प्रयोग कर रहा है।
आह, यह कुछ पढ़ाई-लिखाई से संबंधित
है," मैंने कहा। उसके बाद चूँकि बत्ती लाल हो
गई थी सो मैंने पूछा, "तुम कभी स्कूल गए हो?"
"कभी नहीं," उसने जवाब दिया। फिर बात बढ़ाते
हुए उसने गर्व से कहा, "मैं जब इतना ऊँचा था
तभी से मैंने काम करना शुरू कर दिया था।"
उसने मेरी साइकिल की गद्दी के बराबर अपने
आप को नया। "पहले मेरी माँ मेरे साथ आती
थी, लेकिन अब मैं अकेला ही कर लेता हूँ।"
'अभी तुम्हारी माँ कहाँ है?" मैंने पूछा। पर
तब तक बत्ती हरी हो गई और मैं चल पड़ा।
मैंने उसे अपने पीछे कहीं से चिल्लाते हुए सुना,
"वह मेरठ में है और उसके साथ.... "।
बाकी ट्रैफिक के शोरगुल में डूब गया।
"मेरा नाम समीर है," उसने अगले दिन
कहा और बड़े शरमाते हुए मेरा नाम पूछा,
“आपका नाम?" यह तो बड़े आश्चर्य की बात
क थी। मेरी साइकिल डगमगाए।"मेरा नाम भी
समीर है", मैंने बताया। "क्या", उसकी आँखें
में एकदम से चमक उठीं। "हाँ". मैंने मुस्कुराते
हुए कहा। "तुम्हें पता है समीर का अर्थ है -
- हवा, पवन। और पवन पुत्र कौन हैं जानते हो
न? हनुमान!"
"तो अब से आप समीर एक और मैं समीर
दो ", उसने खूब खुश होते हुए कहा। "हाँ,
ठीक है" मैंने जवाब दिया और अपना हाथ
आगे बढ़ाया। "हाथ मिलाओ समीर दो।"
उसका छोटा-सा हाथ मेरे हाथ में एक नन्हीं
चिड़िया की तरह समा गया। मैं साइकिल
चलाकर आगे बढ़ चुका था, पर उसके हाथ
की गर्माहट अब तक महसूस कर रहा था।
अगले दिन उसके चेहरे पर उसकी
चिरपरिचित मुस्कान नहीं थी। "मेरठ में बड़ी
गडबड हो गई है," उसने कहा। "वहाँ दंगों में
बहुत लोग मारे गए हैं।" मैंने मुख्य अखबार की
सुर्खियों की तरफ देखा। बड़े-बड़े अक्षरों
में लिखा था सांप्रदायिक दंगे। "लेकिन
समीर." मैंने शुरू किया ही था। "मैं मुस्लिम
समीर हूं," वह बोल पड़ा। "और मेरे सभी लोग
मेरठ में हैं।" उसकी आँखें भर आई। जब मैंने
उसके कंधे पर हाथ रखा, उसने नजर ऊपर
नहीं उठाई।
अगले दिन वह चौराहे पर नहीं था। न उसके
अगले दिन वह दिखा और न आगे फिर कभी।
अंग्रेजी या हिंदी का कोई अखबार मुझे नहीं बता
सकता कि मेरा समीर दो आखिर कहाँ गया।


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