अरे वो क्लास में , वो लड़के होता है ना। जिसका काम लुच्चा वाला होता है। पर उसको सजा ऐसी मिलती है-
ये क्लास के बाहर घूम रहा है। टीचर उस लड़के को एक - दो थप्पड़ लगते हुए बोलते है- गंदी मछली ये पूरे क्लास को गन्दा कर देगी। और कभी कभी तो लगता है वो बेचारा इतना किया भी नहीं जितना वो पीट रहा है।🤣
वो मै ही हूं😎
खैर ये सब तो स्कूल के उन खट्टी - मीठी यादों में से एक है जिन्हे हम शायद ही भूल सकते है।
मै अपने समय में एक खुराफाती लड़का था, जो हमेशा किसी ना किसी को परेशान करता रहता था। साथ ही मै एक bachbecher भी था।
वो मिश्रा सर की मैथ्स की क्लास को कैसे भूल सकता हूं। जिस में trignometry के एक formula 1/cosC पूछने पर हम सभी लोग जोर से secC चिल्लाते थे।
क्यों की हम लोग उसे secC नहीं बल्कि सेक्सी सोचते थे।🤣🤣🤣🤣🤣
इस तरह से हमरी स्कूल लाइफ अच्छे से बित रही थी।
अगले कुछ ही दिनों में वसंत पंचमी यानी के सरस्वती पूजा आने वाली थी।
हम सभी स्टूडेंट ने चंदा एकत्रित करके सरस्वती पूजा करने का आयोजन किया था। कुछ बच्चे पैसे ना देकर पूजा का समान या प्रसाद के लिए फल दिए थे।🍊🍐
मै पीतल की थाली में मोटे मोटे गाजर को काट कर प्रसाद बना रहा था। ये वही गाजर था जिसे अमित ने अपने खेतों से उखाड़ के लाया था।
गाजर मोटी होने के कारण हम उसका मजाक बना रहे थे।
वो बेचारा चुपचाप कोने में प्ताके काट रहा था।
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इन सब में मै खोया हुआ जरूर था पर मेरी आंखे सिर्फ उसे ही ढूंढ रही थी।
तभी मेन गेट से
सावली चेहरा, काली आंखे, और लंबी बालों वाली हाथ में पूजा की थाली लीए हुए किसी राजकुमारी की तरह आ रही थीं।
वो कीर्ति थी।
कीर्ति मेरे क्लास की निडर और बातूनी (जादा बात बनाने वाली) लड़की थी। वो पढ़ने में भी अच्छी थी, यही कारण है की हम लड़के उसके सामने मूर्ख पंडित जैसा थे।
इस कारण से मै उस से हमेशा चिढ़ता था।
पर मेरे दिल मै उसके लिए बहुत इजत थी। वो पता नहीं क्यों मुझ से हमेशा लरती थी और गुस्सा करती थी और ना पढ़ने की ताना देती थी।
लेकिन पता नहीं क्यों! वो मुझे फिर भी अच्छी लगती थी।🥰
वो हर दिन स्कूल समय पर आती थी पर आज सरस्वती पूजा के दिन भी वह स्कूल सुबह के 9 बजे तक नहीं आई थी।
मेरी आंखे इधर - उधर उसे ही ढूंढ रही थी, अचानक
अरे वाह ! कीर्ति को देख कर मेरे मुंह से यह सब्द अचानक ही निकल गया।
आसमानी रंग की टॉप, निली बिंदी, हाथो में पूजा की थाली और उसके हाथ में एक पीली रंग का पैकेट में शायद अबीर था जो पूजा के बाद सब को लगाने के लिए लाई होगी।
उसे देख कर मेरी खुशी सातवे आसमान पर थी,दिल कर रहा था अभी उससे कुछ बाते करू।
मगर उसकी लड़ाकू स्वभाव से डर रहा था, कहीं प्रिंसिपल से बोल के ठुकाई ना करवा दे।😅 वैसे भी मुझे वो ठोकते ही रहते थे।
मेरे स्कूल में लड़कियों से बात करना सख्त मना था।
"मै प्रसाद काटने में हेल्प करू? कीर्ति बोली।
मुझे अजीब लगा, जो लड़की लरती थीं, वो आज हेल्प करने की बात कर रही थी।
मै तो इसे सरस्वती मा की किरपा मान लिया था। पर दोस्त हमेशा कहता थे सरस्वती मा शिर्फ़ ज्ञान देती है लड़कियां नहीं।
"हा हा ... जरूर" मै ने लड़खड़ाती जुबान से बोला। अब हम दोस्तो के अलावा कीर्ति भी प्रसाद काटने लगी।
कभी कभी गाजर को पकड़ने में मेरी अंगुलियाँ उसकी उंगलियों से टच कर जाती थी । वो आज बहुत खूबसूरत और खुश मिजाज लग रही थी ।
आधे घण्टे बाद पूजा शुरू हो गयी थी , सभी विद्यार्थी माँ की प्रतिमा के पास बैठा था ।
मैं और कीर्ति छोटी - छोटी समान को लाकर प्रतिमा के पास लाकर रख रहा था । उसके एक हाथ मे पीली थैली में अबीर की पुड़िया थी ।
सब चीजे सही कर मैं भी प्रतिमा के पास बैठ गया और कीर्ति मेरे बगल में ही खड़ी थी ।
अचानक से एक लड़की ने कीर्ति के हाथ से अबीर की पुड़िया खिंचने की कोशिश किया , पुड़िया तो छीन नही पायी लेकिन वह दो भाग में जरूर बट चुका था । और उसकी पूरी अबीर मेरे सर पर गिर चुका था ।
अबीर माथे से होकर चेहरे पर फैल गयी थी , पूरे चेहरे अबीर से लाल हो गयी थी और उसके चेहरे शर्म से ।
सभी लड़के लड़कियां ठहाके मार कर हँस रहे थे , और मैं चुप - चाप अबीर को हटाने की कोशिश कर रहा था ।
कीर्ति अगले दिन मुझसे माफी मांगी थी और फिर उस दिन के बाद हम दोनों एक अच्छे दोस्त बन गए थे । और ये दोस्ती कब to be continue.....

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