चलो आज एक पेंटिंग बनाते हैं, शहर की भीड़ से कुछ दूर,

एक गाँव बनाते हैं, फिर गाँव में एक घर बनाते हैं, घर तक जाने को चौड़ी सड़क नही पतली पगडंडी बनाएँगे, घर के तीन तरफ, बड़े बड़े पेड़ बनाएंगे, हरे-भरे खेत बनाते हैं, फिर बीच में, कुछ और घर बनाते हैं, इसमें बगल में मुंबई वाले चाचा का घर, पीछे दिल्ली वाले ताऊ जी घर, इन घरों में कुछ लोग भी बनाते हैं, चाचा भी, चाची भी, ताऊ जी भी, ताई जी भी, सोनू, मोनू, विमल, और रचना बाहर खेलते हुए बाकी सब बातें करते हुए आँगन में हाँ, आँगन दोनों तरफ बनाएँगे, सामने जोशी जी का मकान है, वो जो सिंगापुर शिफ्ट हो गये हैं, उनका मकान भी बनाना है, वहाँ, महेश, दिनेश, और मंजू खेलते हुए बनाएँगे, घर से कुछ दूर, एक बरगद का पेड़, घना, लंबा, और उसमें लगे हुए कई सारे मधुमक्खी के छट्टे बनाएँगे और साथ में बनाएँगे, अगल बगल से इकट्ठे हुए सारे लोग, बातें करते हुए, घर की, बाहर की, और अपनी कहानियाँ सुनाते हुए, और कुछ बच्चे भी बरगद की, लाटो में झूलते हुए, फिर शाम का वो डूबता हुआ सूरज कुछ घरों को लौटते हुए, बनाएँगे कुछ मवेशियों के काम पर जाते हुए लोग बनाएँगे, फिर रात को भी उतारना है, कानवास पर शांत, निर्मल, कोमल, चाँद के साथ, वही आँगन पर बतियाते बड़ों और खेलते बच्चों के साथ





कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है


नई-नई आंखें हों, तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सारे अपने जैसे हैं जिससे अब तक मिले नहीं, वो अक्सर अच्छा लगता है मेरे आंगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने सांचे हैं जो मूर्ति में ढल जाए, वो पैकर अच्छा लगता है हमने भी सोकर देखा है नए-पुराने शहरों में जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है